India-EU Trade Agreement 2026: यह खबर आपकी रसोई के बजट से लेकर आपके सपनों की कार की कीमत तक, सब कुछ बदलने वाली है।

अगर आपको लगता है कि ‘फ्री ट्रेड एग्रीमेंट’ (FTA) सिर्फ फाइलों और नेताओं के बीच की बात है, तो आप गलत हैं। अगले कुछ दिनों में नई दिल्ली में जो हस्ताक्षर होने जा रहे हैं, उनका सीधा असर आपकी जेब पर पड़ने वाला है।

भारत और यूरोप के बीच दशकों से अटका हुआ वह ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ यानी महा-व्यापार समझौता अब अपने अंतिम पड़ाव पर है। खबर है कि 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के मौके पर जब यूरोपीय संघ (EU) के दिग्गज नेता भारत में होंगे, तो इस ऐतिहासिक सौदे का एलान हो सकता है। यह सिर्फ व्यापार नहीं, आपके लाइफस्टाइल का नया अध्याय है।

क्या सस्ता होगा और क्या महंगा?

सबसे बड़ा सवाल यही है। इस समझौते के बाद यूरोप से आने वाली लग्जरी कारें (BMW, Mercedes, Audi), प्रीमियम चॉकलेट, इतालवी वाइन और हाई-एंड इलेक्ट्रॉनिक्स पर लगने वाली भारी-भरकम ड्यूटी (जो कभी-कभी 100% तक होती है) में बड़ी कटौती की उम्मीद है।

लेकिन यह एकतरफा नहीं है। भारत ने भी अपनी शर्त साफ रखी है—अगर हम आपकी गाड़ियों को रास्ता देंगे, तो हमारे कपड़ा (Textiles), हस्तशिल्प और आईटी सेक्टर को यूरोप के बाज़ारों में बिना किसी रुकावट के एंट्री मिलनी चाहिए। इसका मतलब है भारत में लाखों नए रोज़गार और छोटे व्यापारियों के लिए सीधे विदेशी कमाई का मौका।

‘कार्बन टैक्स’ की आखिरी अड़चन

सब कुछ इतना आसान भी नहीं है। यूरोप का नया ‘कार्बन टैक्स’ (CBAM) भारत के लोहा और स्टील सेक्टर के लिए गले की फांस बना हुआ है। भारत का कहना है कि आप पर्यावरण के नाम पर हमारे व्यापार को नहीं रोक सकते। बातचीत की मेज पर इसी एक अड़चन को सुलझाने के लिए दिन-रात माथापच्ची हो रही है। अगर यह सुलझ गया, तो भारत के लिए यूरोप का दरवाज़ा हमेशा के लिए खुल जाएगा।

यह समझौता ‘इमोशनल’ क्यों है?

इमोशनल पीक: ज़रा उस मध्यमवर्गीय भारतीय युवा के बारे में सोचिए जो अपनी पहली बड़ी नौकरी की शुरुआत कर रहा है। उसके लिए एक ‘आईफोन’ या ‘यूरोपीय ब्रांड’ का जूता सिर्फ एक सामान नहीं, बल्कि उसकी मेहनत और कामयाबी की पहचान है। आज वह इन चीज़ों के लिए दुनिया में सबसे ज़्यादा कीमत चुकाता है क्योंकि बीच में टैक्स की दीवारें खड़ी हैं। यह समझौता उन दीवारों को गिराने की दिशा में पहला कदम है। यह एक संकेत है कि दुनिया अब भारत को सिर्फ एक ‘बाज़ार’ नहीं, बल्कि एक ‘बराबर का साझीदार’ मान रही है।

क्या वाकई कीमतें कल ही गिर जाएंगी?

नहीं, यह कोई जादू की छड़ी नहीं है। समझौते के बाद नियमों को ज़मीनी स्तर पर लागू होने में 6 से 12 महीने का वक्त लग सकता है। लेकिन यह तय है कि आने वाले समय में ‘मेड इन जर्मनी’ या ‘डिज़ाइन इन इटली’ जैसे लेबल आपकी पहुंच के और करीब होंगे।

27 जनवरी को जब प्रधानमंत्री मोदी और यूरोपीय संघ के नेता एक साथ बैठेंगे, तो पूरी दुनिया की नज़र भारत पर होगी। क्या भारत अपनी शर्तों पर दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक गुट को झुका पाएगा? यह आने वाले कुछ घंटे तय करेंगे।

आने वाले दिनों में बाज़ार का रुख बदलने वाला है—क्या आप इस बदलाव के लिए तैयार हैं?

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